कविता
दिखने लगा है मुझेदिखने लगा है मुझे
जब अपनी टूटी हुई दाहिनी टाँग लिए अस्पताल के बेड पर महीनों पड़ा रहा था मैं मेरे अपनों में से कभी कोई और कभी कोई वहाँ आते-जाते रहे थे चलता रहा था लंबे समय तक उबाऊ एक दौर औपचारिकता का तब एक तुम ही तो थी जो अपनी उपस्थिति और अनुपस्थिति में धागा निर्मित करती तकली-सी मेरे इर्द-गिर्द अनवरत चक्कर काटती रहती थी और तब शायद अपने जीवन में पहली बार तुम्हारी वास्तविकता को समझ पाने की एक ईमानदार कोशिश की थी मैंने परीक्ष्ाा के कठिन प्रश्नों में उलझे रहने का-सा वक्त था यह तुम्हारा मेरी आँखेंं तुम पर ही टिकी रहती थी आज तुम चेन्नई में हो और मै यहाँ बोकारो में उत्तार-दक्षि्ाण का एक लंबा फ़ासला है हमारे बीच पर मुझे लगता है की तुम यहीं मेरे पास हो हमारी शादी के चालीस वर्ष बाद पहली बार आज अपने अन्दर काले कठोर कमल-बीज के अंदर का हरा-हरा अंकुर सा कुछ दिखने लगा है मुझे।जब अपनी टूटी हुई दाहिनी टाँग लिए अस्पताल के बेड पर महीनों पड़ा रहा था मैं मेरे अपनों में से कभी कोई और कभी कोई वहाँ आते-जाते रहे थे चलता रहा था लंबे समय तक उबाऊ एक दौर औपचारिकता का तब एक तुम ही तो थी जो अपनी उपस्थिति और अनुपस्थिति में धागा निर्मित करती तकली-सी मेरे इर्द-गिर्द अनवरत चक्कर काटती रहती थी और तब शायद अपने जीवन में पहली बार तुम्हारी वास्तविकता को समझ पाने की एक ईमानदार कोशिश की थी मैंने परीक्ष्ाा के कठिन प्रश्नों में उलझे रहने का-सा वक्त था यह तुम्हारा मेरी आँखेंं तुम पर ही टिकी रहती थी आज तुम चेन्नई में हो और मै यहाँ बोकारो में उत्तार-दक्षि्ाण का एक लंबा फ़ासला है हमारे बीच पर मुझे लगता है की तुम यहीं मेरे पास हो हमारी शादी के चालीस वर्ष बाद पहली बार आज अपने अन्दर काले कठोर कमल-बीज के अंदर का हरा-हरा अंकुर सा कुछ दिखने लगा है मुझे।
कविता संग्रह: “हाशिये पर से” · 2019