रणधीर चन्द्र गोस्वामी
R C Goswami · Poet
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कविताएँ
Poems
ख़बरनिगार
khabarnigaar
डहर पर
शहर में बाघ
shahar men baagh
जंगलों में अब नहीं रहे बाघ
महेंद्र सिंह के प्रति
mahendr sinh ke prati
दरकती दीवारें/टूटे-फूटे छप्पर
महानगर
mahaangar
उबलते अंडे सा
कहीं न कहीं तो मिलेंगे ही हम
kahin n kahin to milenge hi ham
एक ही तो
बढ़े चलो
बढ़े चलो
राह पर चले चलो
घने जंगल में
ghane jangal men
दिल चुराकर कहते हो
शिव
shiv
शिव ही है ब्रह्म
क्या एक नहीं हमघ्
kyaa ek nahin hamagh
क्या एक नहीं हमघ्
पुजारी ये राम के
pujaari ye raam ke
हिमायती ये राम-राज्य के
मन
man
मनमौजी इस मन का कहो करें तो क्या करें हम
मुलाकात
mulaakaat
हर मुलाकात में
चलते ही रहेंगे हम
chalte hi rahenge ham
काल!
खिल जाओ
khil jaao
फैला दी हैं मैंने
सफर में जो चले थे
saphar men jo chale the
भुखमरी शोषण गरीबी
हवा विषैली चली कहाँ से घ्
havaa vishaili chali kahaan se gh
अंदर मन की गहराई में
सपनों का सौदागर
sapnon kaa saudaagar
आओ बच्चे ले लो सपने
मैं दधीचि बोल रहा हूं
main dadhichi bol rahaa hoon
हैलो सुन रहे हैं आपघ्
ये तो हम हैं आपके सामने
ye to ham hain aapke saamne
बम फोड़कर नहीं आते चूहे
सच कहती हूँ
sach kahti hoon
जब मेरे जीवन-साथी
तोहफा
tohphaa
देकर कब के दिल अपना आपको
कृष्ण ही ॐ है
krishn hi om hai
कृष्ण कृष्ण कृष्ण
आन-बान-शान
aan-baan-shaan
यह भारत देश हमारा
केवल वही
keval vahi
वही
कुछ न पूछना उनसे
kuchh n poochhnaa unse
ज्ञान की तलाश में कहाँ कहाँ
मेरी प्यारी माँ
meri pyaari maan
जरूरी नहीं रहा अब
सपना
sapnaa
सपना हाँ हाँ सपना
दिखने लगा है मुझे
दिखने लगा है मुझे
जब अपनी टूटी हुई
नेताजी
netaaji
नेताजी
बात ही बात में
baat hi baat men
बात है प्रात की
रूपांतरण
roopaantran
दीपक हैं आप/जलते रहिए
बर्फ-से पिघल गए
barph-se pighal gae
यही सोचते सोचते
धरती को बचाने की बाबत
dharti ko bachaane ki baabat
रुको
तीर्थंकर
tirthankar
हे साधु! हे अमृतपुत्र!
होली
holi
आओ मिल-जुल कर हम
सच कहता हूँ
sach kahtaa hoon
आपकी तस्वीर को
भूख के खिलाफ
bhookh ke khilaaph
भयानक गर्मी
कौन हूँ मैंघ्
kaun hoon maingh
खुदा की कारीगरी को
चाँदनी
chaandni
भूला नहीं गाँव
स्पर्श
sparsh
दिल से निकलकर
एक है मंजिल हमारी
ek hai manjil hamaari
सर्वाकर्षक
किरणों नहाई सुबह-शाम
kirnon nahaai subah-shaam
यूँ तो धरती पर
अंतज्र्योति
antajryoti
तू है मेरी अंतज्र्योति
फाग की आग
phaag ki aag
देखो तो
प्रकृति
prakriti
प्रकृति हो तुम
अपने ज़मीर से रू-ब-रू होता आतंकवादी
apne zamir se roo-b-roo hotaa aatankvaadi
सचमुच
पिता
pitaa
पापा
चिंतित है शहर
chintit hai shahar
रात को ठीक से
खिलखिला उठी कविता
khilkhilaa uthi kavitaa
दूसरों की खुशी में
अभी-अभी
abhi-abhi
मौन रह कर भी
पृथ्वी है वह
prithvi hai vah
देखो/गौर से देखो उसे
किरणें
kirnen
सुबह-सुबह मेरे घर का
दरख़्त का दुःख
darakht kaa duhkh
अब कुछ भी तो बचा
तनकर चलती है लड़की
tankar chalti hai larki
सड़क के एक किनारे से लगकर
अधूरा जीवन
adhooraa jivan
सामने की पहाड़ी से
हाशिये पर से
haashiye par se
अपनी आँखों को
अँधेरे में
andhere men
गले में मेरे ठर्रा
आना चाहता हूं मैंै
aanaa chaahtaa hoon mainai
आना चाहता हूं मैंै
फिर आएंगे भेड़िए
phir aaenge bherie
आए थे भेड़िए
ताश के महल
taash ke mahal
तरंगें उमड़ती थी
दीपावली
dipaavli
किसी अमावस की रात को
दुआ
duaa
आज बहुत ज्यादा है ठंड
तुम!
tum!
बार-बार मुझसे रूठकर
माँ
maan
आई थी माँ
खंडहर
Khandahar
रुपहली रातों में
अद्वैत
Advaita
मैं नहीं हूँ