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कविताएँPoems

ख़बरनिगारkhabarnigaar डहर पर शहर में बाघshahar men baagh जंगलों में अब नहीं रहे बाघ महेंद्र सिंह के प्रतिmahendr sinh ke prati दरकती दीवारें/टूटे-फूटे छप्पर महानगरmahaangar उबलते अंडे सा कहीं न कहीं तो मिलेंगे ही हमkahin n kahin to milenge hi ham एक ही तो बढ़े चलोबढ़े चलो राह पर चले चलो घने जंगल मेंghane jangal men दिल चुराकर कहते हो शिवshiv शिव ही है ब्रह्म क्या एक नहीं हमघ्kyaa ek nahin hamagh क्या एक नहीं हमघ् पुजारी ये राम केpujaari ye raam ke हिमायती ये राम-राज्य के मनman मनमौजी इस मन का कहो करें तो क्या करें हम मुलाकातmulaakaat हर मुलाकात में चलते ही रहेंगे हमchalte hi rahenge ham काल! खिल जाओkhil jaao फैला दी हैं मैंने सफर में जो चले थेsaphar men jo chale the भुखमरी शोषण गरीबी हवा विषैली चली कहाँ से घ्havaa vishaili chali kahaan se gh अंदर मन की गहराई में सपनों का सौदागरsapnon kaa saudaagar आओ बच्चे ले लो सपने मैं दधीचि बोल रहा हूंmain dadhichi bol rahaa hoon हैलो सुन रहे हैं आपघ् ये तो हम हैं आपके सामनेye to ham hain aapke saamne बम फोड़कर नहीं आते चूहे सच कहती हूँsach kahti hoon जब मेरे जीवन-साथी तोहफाtohphaa देकर कब के दिल अपना आपको कृष्ण ही ॐ हैkrishn hi om hai कृष्ण कृष्ण कृष्ण आन-बान-शानaan-baan-shaan यह भारत देश हमारा केवल वहीkeval vahi वही कुछ न पूछना उनसेkuchh n poochhnaa unse ज्ञान की तलाश में कहाँ कहाँ मेरी प्यारी माँmeri pyaari maan जरूरी नहीं रहा अब सपनाsapnaa सपना हाँ हाँ सपना दिखने लगा है मुझेदिखने लगा है मुझे जब अपनी टूटी हुई नेताजीnetaaji नेताजी बात ही बात मेंbaat hi baat men बात है प्रात की रूपांतरणroopaantran दीपक हैं आप/जलते रहिए बर्फ-से पिघल गएbarph-se pighal gae यही सोचते सोचते धरती को बचाने की बाबतdharti ko bachaane ki baabat रुको तीर्थंकरtirthankar हे साधु! हे अमृतपुत्र! होलीholi आओ मिल-जुल कर हम सच कहता हूँsach kahtaa hoon आपकी तस्वीर को भूख के खिलाफbhookh ke khilaaph भयानक गर्मी कौन हूँ मैंघ्kaun hoon maingh खुदा की कारीगरी को चाँदनीchaandni भूला नहीं गाँव स्पर्शsparsh दिल से निकलकर एक है मंजिल हमारीek hai manjil hamaari सर्वाकर्षक किरणों नहाई सुबह-शामkirnon nahaai subah-shaam यूँ तो धरती पर अंतज्र्योतिantajryoti तू है मेरी अंतज्र्योति फाग की आगphaag ki aag देखो तो प्रकृतिprakriti प्रकृति हो तुम अपने ज़मीर से रू-ब-रू होता आतंकवादीapne zamir se roo-b-roo hotaa aatankvaadi सचमुच पिताpitaa पापा चिंतित है शहरchintit hai shahar रात को ठीक से खिलखिला उठी कविताkhilkhilaa uthi kavitaa दूसरों की खुशी में अभी-अभीabhi-abhi मौन रह कर भी पृथ्वी है वहprithvi hai vah देखो/गौर से देखो उसे किरणेंkirnen सुबह-सुबह मेरे घर का दरख़्त का दुःखdarakht kaa duhkh अब कुछ भी तो बचा तनकर चलती है लड़कीtankar chalti hai larki सड़क के एक किनारे से लगकर अधूरा जीवनadhooraa jivan सामने की पहाड़ी से हाशिये पर सेhaashiye par se अपनी आँखों को अँधेरे मेंandhere men गले में मेरे ठर्रा आना चाहता हूं मैंैaanaa chaahtaa hoon mainai आना चाहता हूं मैंै फिर आएंगे भेड़िएphir aaenge bherie आए थे भेड़िए ताश के महलtaash ke mahal तरंगें उमड़ती थी दीपावलीdipaavli किसी अमावस की रात को दुआduaa आज बहुत ज्यादा है ठंड तुम!tum! बार-बार मुझसे रूठकर माँmaan आई थी माँ खंडहरKhandahar रुपहली रातों में अद्वैतAdvaita मैं नहीं हूँ